ग़ज़ल: महक उठेगी दुनिया


महक उठेगी दुनिया खुशियों का संसार मिलेगा
बाप बना हूँ मैं,मुझको बेटी का प्यार मिलेगा
क्या होता आया है अब तक, छोड़ो इस ढ़र्रे को
बेटी को बेटी का अब पूरा अधिकार मिलेगा
नन्ही सी बेटी की ऊँगली थाम के जब निकलूँगा
गांव मोहल्ले में मुझको आदर सत्कार मिलेगा
बेटी के मासूम से मुखडे़ को मैं जब देखूँगा
ईश्वर के दर्शन होंगे रब का दीदार मिलेगा
है आभार ‘‘सलिल‘‘ ईश्वर का बाप बना जो बेटी का
इसके कन्यादान से ही तो स्वर्ग का द्वार मिलेगा
- सोहन परोहा ‘‘सलिल’’


महिलाओं के हक़ में उठते हाथ "बिटिया" भी साथ