गीत.धीरेन्द्र गहलोत धीर

गीत
प्रकृति का हेै अनुपम उपहार,
जगत का है, ये मूल आधार।
इन्हें न यूँ बिसराओ रे,
नित्य हो रहीं नष्ट बेटियाँ इन्हें बचाओ रे,
आज ये पुण्य कमाओ रे।।
इन्हें जन्म से पहले ही क्यों
मार दिया करते हो,
क्यों ममता का आँचल-
तार-तार किया करते हो।
देखने दो इनको संसार,
और पाने दो माँ का प्यार।
ये हक़ इनको दिलवाओ रे -
माता-पिता होने का कुछ तो फ़र्ज निभाओ रे
और न पाप कमाओ रे।।
शक्ति स्वरूपा कहकर जिसकी -
पूजा हम करते हैं,
उसका ही प्रतिरूप मिटाकर,
कृत्य अधम करते हैं।
ये कैसा नारी का सम्मान,
स्वयं करते पल-पल अपमान।
न खुद को और गिराओ रे,
अपनी गौरवमय संस्कृति को -
नहीं मिटाओ रे, देश का मान बढ़ाओ रे।।
कथनी और करनी का अंतर,
जब तक नहीं मिटेगा।
तब तक अन्धे विश्वासों का,
कोहरा नहीं छटेगा।
काम निष्काम हो एक समान,
एक हो भर लो इनमें प्राण।
नेक बनकर दिखलाओ रे,
बेटे-बेटी दोनों पर ही, प्यार लुटाओ रे।
न्याय का सूर्य उगाओ रे।।
- धीरेन्द्र गहलोत ‘‘धीर’’


महिलाओं के हक़ में उठते हाथ "बिटिया" भी साथ