3. ‘‘बिटिया’’ के सदस्यों के लिए उन्मुखीकरण कार्यशाला - 17 जुलाई, 2011

दिनांक 17 जुलाई, 2011 को भोपाल की आर.सी.व्ही. नरोन्हा प्रशासन अकादमी में ‘‘बिटिया’’ सदस्यों के लिए एक उन्मुखीकरण कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला आयोजन का उद्देश्य सदस्यों को संस्था के उद्देश्यों से अवगत कराना और विचार-विमर्श कर आगामी रणनीति तैयार करना था। कार्यक्रम में डाॅ राका आर्य, नेशनल लाॅ यूनिवर्सिटी एवं डाॅ पी. आर. देव, यू.एन.एफ.पी.ए. आमंत्रित अतिथि के रूप में उपस्थित थे। श्रीमति शिल्पी अगनानी, सचिव, बिटिया ने संस्था के उद्देश्य एवं लक्ष्यों से अवगत कराया। 
अध्यक्ष श्री राजेश जोशी ने कहा कि लड़कियांे के साथ किए जा रहे भेदभाव और दोयम दर्जे के व्यवहार को बदलने में मध्यम वर्ग की विशेष भूमिका हो सकती है। समाज के व्यवहार एवं सोच में परिवर्तन लाकर घटते शिशु लिंगानुपात में कमी लायी जा सकती है। मध्यम वर्ग को एक साथ जोरदार आवाज में यह कहना चाहिए कि ‘मेरी बेटी, मेरा गौरव’। 
डाॅ. राका आर्य ने महिलाओं विशेषकर लड़कियों के प्रति होने वाले भेदभाव और यौन उत्पीड़न के संदर्भ में अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि पुराने समय में माता पिता लड़कियों को विधि के क्षेत्र में कार्य करने के लिये स्वीकृति नही देते थे, क्योंकि  इस क्षेत्र में कार्य करने वाली महिलाओं को लेकर कई  भ्रांतियां थी, पर अब स्थिति बदल गई है अब न सिर्फ बड़े शहरों में बल्कि छोटे शहरों में भी महिलाएं विधि क्षेत्र में आगे आ रही हैं। यह स्वरगत योग्य है, परन्तु अभी भी लंबी दुरी तय करनी बाकी है। उन्होंने कहा कि महिला/लड़की को कभी भी उसकी व्यैक्तिक पहचान के रूप में नहीं जाना जाता है, न ही उसकी इच्छा या सपनों का सम्मान किया जाता है। यहां तक की बड़ी उम्र में भी उसे अपने बच्चों के आधीन माना जाता है। उसे हमेशा एक जिम्मेदारी समझा जाता है। बेटियों का लालन-पालन और शिक्षा परिवार की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती है। सारी परिस्थितियां उसे एक बहन, माँ, बेटी या पत्नी के रूप में केवल मूक दर्शक बनाती है और सहन करने के लिए मजबूर करती है। 
श्रीमती कनीज़ राजवी ने ‘पेन’ के बारे में बताया। ‘पेन’ अशिक्षित लोगों के लिए अनौपचारिक शिक्षा में सहयोगी हो सकता है, साथ ही जेण्डर समानता के संदेशों को समुदाय में फैला सकता है। 
डाॅ. मनोहर अगनानी ने सामाजिक प.िश्य में जेण्डर असमानता एवं भेदभाव और घटता शिशु लिंगानुपात के परिपे्रक्ष्य में जटिलताओं और समस्याओं पर चर्चा की। उन्होेंने कहा कि सिर्फ कानून इस समस्या का समाधान नहीं है हर व्यक्ति को खुद बदलकर इसकी शुरूआत करनी होगी तभी समाज बदल सकेगा। 
कार्यशाला के अंत में सभी सदस्यों ने लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की और इस कार्य के लिए अपनी सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करने का प्रण लिया।


महिलाओं के हक़ में उठते हाथ "बिटिया" भी साथ