लेख: कारण और समाधान तलाशती एक समस्या

वर्ष 2001 की जनगणना में देश में तेजी से घटते हुए शिशु लिंगानुपात के संबंध में प्रस्तुत आॅंकड़ों को देखकर लिंग परीक्षण आधारित कन्या भ्रूण हत्या की बढ़ती प्रवृत्ति की समझ तो मुझमें पैदा हुई थी, लेकिन इसका गहरा अहसास तब हुआ जब मैं मुरैना जिले में अक्टूबर, 2004 में कलेक्टर बनकर पहुंचा। मुरैना कार्यभार ग्रहण करने से पहले जब मैं तत्कालीन मुख्य सचिव से भेंट करने गया तो उन्होंने निर्देश दिए कि मुरैना में मुझे घटते हुए शिशु लिंगानुपात के सुधार के लिए विशेष प्रयास करने चाहिए।
अपनी पदस्थापना के शुरू के दिनों में ही एक दिन मैं एक आंगनबाड़ी केन्द्र गया एवं आंगनबाड़ी केन्द्र के रजिस्टर के अवलोकन के समय यह अहसास हुआ कि रजिस्टर में दर्ज बेटों की संख्या की तुलना में बेटियों की संख्या बहुत कम थी। यह मेरे लिए कोई नया तथ्य नहीं था, क्योंकि 2001 की जनगणना के आॅंकड़ों से मैं पहले से ही अवगत था। फिर भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से मैंने यह प्रश्न किया कि आपकी आंगनबाड़ी में दर्ज बेटियों की संख्या कम क्यों है? आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने सीधा एवं सटीक जवाब दिया कि ‘‘गांव में बेटियां हो तो दर्ज करूँ।’’
मैंने तुरन्त हर गांव में जन्म से लेकर 5 साल तक के बच्चों में बेटे एवं बेटियों की संख्या का आंकलन करने के निर्देश महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों को दिए और प्राप्त आॅंकड़े जनगणना -2001 के आॅंकड़ों की पुष्टि ही करते हुए नजर आए, बल्कि सच तो यह है कि आॅंकड़े 2001 की तुलना में और भी खराब थे। मुझे जिले के विभिन्न स्टेकहोल्डर्स से बात करके यह समझ में आ गया था कि जिले के कुछ चिकित्सक लिंग परीक्षण आधारित कन्या भ्रूण हत्या में संलग्न हैं एवं पारम्परिक रूप से कुछ क्षेत्रों में ही व्याप्त कन्या शिशु वध का स्थान अब लिंग परीक्षण आधारित कन्या भ्रूण हत्या ने व्यापक रूप से ले लिया था। चिकित्सकों से जब इस संबंध में बात की तो वे इन्कार की मुद्रा ही अख्तियार करते नजर आए।
हमारे देश में इस सामाजिक समस्या के प्रति भी एक denial syndrome का रूख रहा है, जिसमें सबसे पहला denial  यह है कि यह कोई समस्या है। घटते हुए शिशु लिंगानुपात के संबंध में यह कमदपंस प्रारंभिक वर्षों में समाज के हर वर्ग में व्याप्त था एवं इस क्षेत्र में काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनों एवं प्रशासनिक अधिकारियों को इस denial का सामना करना पड़ता था। मैं यह कह सकता हूँ कि मुरैना जिले में मेरी पदस्थापना के मात्र 8 महीने में हमने इस denial को जनगणना-2001 के आॅंकड़ों को प्रस्तुत कर लगभग तोड़ दिया था। अब सामने denial syndrome का दूसरा चरण था, जिसमें समाज के विभिन्न जाति समूहों द्वारा यह तो स्वीकार किया जा रहा था कि घटता हुआ शिशु लिंगानुपात एक समस्या है, लेकिन अब denial  यह था कि घटता हुआ शिशु लिंगानुपात उनकी जाति की भी समस्या है और उनमें से अधिकांश बहुत सुविचारित तर्क के साथ इस सच्चाई को स्वीकार करने से बचते नजर आते थे।
इसके बाद राजस्थान में राजस्थान यूनिवर्सिटी वूमेन एसोसिएशन के साथ विभिन्न जाति संगठनों के साथ कार्यशालायें कर उनको हमने विषय की गंभीरता को समझाने का प्रयास किया और अनुभव यह रहा कि समाज के विभिन्न जाति समुदाय भी यह स्वीकार करने लगे थे कि हाँ यह समस्या है और हाँ यह उनकी समस्या भी है। लेकिन अब denial syndrome का तीसरा चरण जिसमें यह तर्क दिया जाता है कि जो कारण लिंग परीक्षण आधारित कन्या भ्रूण हत्या के पीछे दिए जा रहे हैं, वे कारण सही नहीं हैं, अभिव्यक्त होने लगा। लिंग परीक्षण आधारित कन्या भ्रूण हत्या के कारण क्या है? इसके संबंध में इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के अपने-अपने मत हैं, अपनी-अपनी विचारधारायें हैं और उन्हें साबित करने के लिए तर्क भी। मैं अपने अनुभव के आधार पर यह कहना चाहता हूँ कि हमारा समाज अभी-भी उस दौर में खड़ा है, जहाँ पर इस समस्या के कुछ लोगों द्वारा कारण बताये जा रहे हैं और जो कारण बताये जा रहे हैं, उन कारणों का denial  विभिन्न आलेखों, अभिव्यक्तियों, आॅंकड़ों एवं अध्ययनों के आधार पर अन्य व्यक्तियों द्वारा किया जा रहा है। कोई इसकी जड़ में दहेज को कारण बता रहा है तो कोई भारतीय समाज में महिलाओं के गिरते हुए स्टेटस को बता रहा है। कोई इसकी जड़ में समाज में सीमित परिवार की चाहत एवं उसके लिए किये जाने वाले प्रयासों को बता रहा है तो कोई इसे सिर्फ तकनीक के दुरूपयोग का दुष्परिणाम बता रहा है। 
चिकित्सकों से जब इस संबंध में बात की जाती है तो वे अभी भी यह तर्क देते हैं कि वे स्वयं यह अपराध नहीं करते, उनमें से कुछ करते हैं और जो करते हैं वे सिर्फ समाज के मांग की पूर्ति करते हैं। मेरा अनुभव यह कहता है कि यह भी एक सीमित अभिव्यक्ति है। आज विभिन्न अध्ययनों से यह प्रमाणित हो गया है कि चिकित्सक समाज की मांग की पूर्ति नहीं करते अपितु वे समाज में मांग पैदा कर रहे हैं। यदि मेरा यह विचार सही नहीं है तो क्यों गोखले इंन्सटीट्यूट, पूणे द्वारा किये गए अध्ययन से यह साबित हो गया है कि जिन जिलों में जितने अधिक सोनोग्राफी केन्द्र हैं, वहाँ शिशु लिंगानुपात उतना ही कम है। 
कुछ लोग दहेज को इसकी जड़ में बताते हैं। दहेज एक सामाजिक कुरीति है, और हो सकता है कि यह एक कारण भी हो। लेकिन यह इस समस्या का एकमात्र अथवा प्रमुख कारण है, यह नहीं माना जा सकता क्योंकि अगर ऐसा होता तो लिंग परीक्षण आधारित कन्या भ्रूण हत्या की समस्या के केन्द्र में संभ्रात एवं शिक्षित परिवार क्यों होते? लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा कि हमारे समाज में अभी इस समस्या के कारण तलाशे जा रहे हैं, अपने-अपने तर्क दिए जा रहे हैं और संभवतः कमदपंस के इस दौर का एक दिन अंत इसके कारणों की पड़ताल के साथ पूरा होगा और तब शुरू होगा denial  का चैथा और अंतिम चरण जिसमें इस समस्या के कारणों के समाधान के लिए उपाय सुझाये जाएंगे और उन सुझावों के विपक्ष में तर्क भी दिये जाएंगे। वैसे यह चरण भी भारतीय समाज में शुरू हो गया है एवं इस समस्या के निदान के लिए विभिन्न उपाय अब सुझाये जाने लगे हैं।
इस आलेख के लिखने का एक उद्देश्य कुछ उन अनुभवों को उजागर करना है, जिनकी स्मृति मात्र ही एक पीड़ा का अहसास कराती है। समाज में यह अभिव्यक्ति कई बार की जाती है कि हर गर्भपात गलत और गैर कानूनी है। मुझे ध्यान आता है कि एक बार शिवपुरी जिले में कलेक्टर की पदस्थापना के दौरान एक संगठन द्वारा कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ एक विशाल रैली का आयोजन किया गया, जिसमें मैं बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित था एवं रैली में कुछ बैनर इस संदेश के साथ थे कि गर्भपात कराना गैर कानूनी है एवं गर्भपात एक जुर्म है।
यहाँ पाठकों की जानकारी के लिए यह कहना चाहता हूँ कि हिन्दुस्तान उन देशों में से एक है, जहाँ न सिर्फ विभिन्न आधारों पर औरत को गर्भपात का अधिकार दिया गया है बल्कि उसके इस हक को दिलाने के लिए कुछ संगठन प्रभावी रूप से काम भी कर रहे हैं। ऐसे में यह संदेश दिया जाना कि हर गर्भपात गैर कानूनी है, अनावश्यक है, और गलत भी है। इससे समाज में स्त्री के गर्भपात के अधिकार को स्थापित करने वाले संगठनों को तो अवश्य पीड़ा पहुंचती होगी लेकिन साथ ही उन संगठनों को भी पीड़ा होती है, जो लिंग परीक्षण आधारित कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अलख जगा रहे हैं। महिला के वैधानिक गर्भपात तक पहुंच को भी ऐसी अभिव्यक्ति सीमित करती है, इसलिए यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि हमारे समाज में लिंग परीक्षण आधारित कन्या भ्रूण हत्या एक अपराध है, न कि हर गर्भपात। 
एक दूसरी पीड़ा का कारण कुछ प्रबुद्ध व्यक्तियों की सार्वजनिक रूप से व्यक्त की जाने वाली वह राय है, जिसमें इस समस्या की जड़ में औरत को ही माना जाता है और यह मत व्यक्त किया जाता है कि औरत ही औरत की दुश्मन है, औरत ही औरत को बाध्य करती है, लिंग परीक्षण कराती है  और बेटी को जन्म लेने से रोकती है। विभिन्न सार्वजनिक मंचों पर जब ऐसी अभिव्यक्ति होती है तो ऐसा लगता है कि वे संभवतः समस्या के लक्षण को ही कारण मान बैठे हैं। यह संभव है कि एक महिला द्वारा किसी दूसरी महिला को लिंग परीक्षण के लिए कहा जाए अथवा बेटी को जन्म से रोकने के लिए कहा जाए लेकिन उसकी जड़ में विद्यमान कारण को संभवतः एक महिला ही बेहतर अभिव्यक्त कर सकती है। हमारे समाज में स्त्री को जन्म से लेकर मृत्यु तक विभिन्न भूमिकाओं मात्र में ही सीमित कर दिया जाता है और इन भूमिकाओं के निर्वहन में भी पग-पग पर पुरूष प्रधान समाज द्वारा उसे जो पीड़ा पहुंचाई जाती है, यह मुमकिन है उस लगातार पीड़ा के कारण महिला के द्वारा ऐसा आग्रह किया जाता हो। मेरे मत में समस्या के मूल में औरत का स्टेटस पुरूष के बराबर नहीं होना है। यह तराजू के उन दो पलड़ों की तरह है, जिसमें काफी असमानता है, इसलिए जब तक किसी भी समाज में स्त्री अथवा पुरूष रूपी दो पलड़ों को बराबर नहीं कर दिया जाता, तब तक किसी को भी यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वे उन पलड़ों में दिखाई दिये जाने वाले फर्क के आधार पर ऐसे निष्कर्ष निकालें। मुझे डर है कि ऐसा कोई भी प्रयास महिला के स्टेटस को और भी कम करेगा और लिंग परीक्षण आधारित कन्या भूण हत्या जैसी समस्याओं को भी बढ़ावा ही देगा। 
मैंने यह भी महसूस किया है कि बेटी को जन्म देने के लिए जो आग्रह विभिन्न गीतों, कविताओं, लेखों, नाटकों आदि के द्वारा किया जाता है, उसमें कई बार जाने-अनजाने में बेटी को याचक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। अर्थात् उसकी समाज में उपयोगिता पर जोर दिया जाता है, जैसे ‘‘मुझे इस पृथ्वी पर जन्म लेने दो मैं रूखा-सूखा खा कर जी लूंगी आदि-आदि’’। मेरे मत में बेटी को याचक के रूप में दिखाया जाना न सिर्फ गलत है, बल्कि यह उसकी समानता के अधिकार के प्रयासों को भी हतोत्साहित करता है। इसी प्रकार कई बार भेदभाव को दर्शाने वाले विज्ञापन भी प्रकाशित किए जाते हैं, जैसे - एक बीमा कम्पनी द्वारा कुछ समय पहले इस किस्म का विज्ञापन दिया जाता था कि बेटी की शादी के लिए और बेटे की पढ़ाई के लिए बीमा करवायें, जो कि बाद में विरोध किए जाने के कारण हटा लिया गया। 
इसी प्रकार कई बार नीति निर्माताओं द्वारा समस्या की गहराई को समझे बिना कई किस्म की लोक-लुभावनी योजनायें प्रस्तुत की जाती हैं। लेकिन यदि इन योजनाओं के मूल में बेटी के बराबरी के हक में किये जाने वाले प्रयासों को हतोत्साहित करने का दोष समाहित हो तो कष्ट होना स्वाभाविक है। उदाहरणस्वरूप कुछ वर्ष पूर्व एक समाचार पत्र में इस शीर्षक के साथ एक समाचार छपा था ‘‘खुशखबरी मत मारिए बेटियों को, उन्हें सहारा देगी सरकार।’’ समाचार एक प्रस्तावित ‘‘पालना योजना’’ से संबंधित था, जिसके तहत प्रत्येक जिले में एक केन्द्र खोलने की योजना थी जिसका लव्वोलुआव यह था कि ‘‘अगर आप बेटी नहीं चाहते तो हमें दे दीजिए। हम बच्चे का पालन पोषण करेंगे।’’ ऐसी योजनाओं के मूल में भावना पवित्र हो सकती है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सवाल सिर्फ बेटी के जन्म लेने के अधिकार का नहीं है, बल्कि उसका अपने माता-पिता के साथ जीवन जीने के हक का भी है। 
मैंने बहुत से पढ़े-लिखे व्यक्तियों को बहुत स्नेह के साथ अपनी बेटी को बेटे के रूप में संबोधित करते हुए सुना है। बेटी को बेटे के रूप में संबोधन ही इस बात का प्रमाण है कि हमारे जेहन में यह अहसास है कि बेटी बेटे से कम है। यह एक ऐसी अभिव्यक्ति है, जो कि हमारे समाज के यथार्थ को प्रतिबिंबित करती है, जिसमें हम पुरूष को स्त्री से श्रेष्ठ मानते हैं एवं उसके अनुरूप आचरण करने की कोशिश करते हैं। मेरे मत में लिंग परीक्षण आधारित कन्या भ्रूण हत्या की प्रवृत्ति पर प्रभावी रोक लगाने के लिये हमें हर वे प्रयास करने होंगे, जो बेटे-बेटी को बराबरी का दर्जा दें, अर्थात् स्त्री-पुरूष समानता के बारे में न सिर्फ विचार करें बल्कि उसके अनुरूप आचरण भी अपनायें। ‘‘बिटिया’’ संस्था के गठन के उद्देश्य की यही पृष्ठभूमि भी है और इसलिए इस संस्था का स्लोगन -‘‘मेरी बेटी, मेरा गौरव है।’’ - डाॅ. मनोहर अगनानी


महिलाओं के हक़ में उठते हाथ "बिटिया" भी साथ