कविता: खोजो तो बेटी पापा कहाँ हैं

जब पापा के पापा के पापा के पापा
पापा के पापा के पापा नहीं थे
तब कोई नहीं था
कहीं पर नहीं था
सूरज यहां था
सूरज की बेटी धरती यहां थी
कैसा सवेरा जो देखे न कोई
धरती बिचारी इस चिन्ता में खोई
पापा के घर का ईंधन जले
न रोटी पके न दुनिया चले
धरती में धीरज था
सूरज में आग
दोनों ने गाया जीवन का राग
धरती के मन में हिलोरें उठीं
पर्वत उठे नदियां बहीं हवाएं चलीं
सूरज खुश होता था
नए रंग बोता था
जब पापा के पापा के पापा के पापा
पापा के पापा के पापा नहीं थे
धरती का मन फूला न समाए
पेड़ उगाए फूल खिलाए
छोटा नहीं था धरती का मन था
इतना खजाना लाखों का धन था
धरती के मन में इतनी बेताबी
कौन संभाले तिजोरी की चाबी
तब पापा के पापा के पापा के पापा
पापा के पापा के पापा जी आए
मम्मी की मम्मी की मम्मी की मम्मी
मम्मी की मम्मी की मम्मी को लाए
गहरा अंधेरा
कैसे बनाएं अपना बसेरा
कोई न घर था
पापा को डर था
न देशी-विदेशी
न कोई पड़ोसी
न चाचा न मामा
न पापा की मौसी
सवेरा हुआ
सूरज का फेरा हुआ
चारों दिशाओं में शरमीली धूप
पापा ने देखा धरती का रूप
रंगों का मेला
पापा ने देखा
मम्मी ने देखा
रंगों का मेला
पत्थर में पानी में सुन्दरता रंगों की
बड़ी कठिन भाषा थी धरती के अंगों की
वैसे तो आफत थी
पापा में ताकत थी
गुन-गुनकर
चुन-चुनकर
चुन-चुनकर
गुन-गुनकर
धरती की भाषा को पढ़ते गए
दुनिया नयी रोज गढ़ते गए
अब पापा के पापा के पापा के पापा
पापा के पापा के पापा नहीं हैं
सूरज यहाँ है धरती यहां है
खोजो तो बेटी पापा कहाँ है
- ध्रुव शुक्ल


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