कविता: बेटी फिक्र लगती थी

बेटा फ़ख्र लगता था
बेटी फिक्र लगती थी
जिसकी सोच में
अब बुढ़ापे में अकेला बैठा है सिर झुकाए
अपने हाथों से खोदी गयी
बेटी की खोज में
और साहिर लुधियानवी के शब्दों को
तोड़कर
पूछता है 
उसे नाज़ था जिस पर वो कहाँ है?
- मनोज श्रीवास्तव


महिलाओं के हक़ में उठते हाथ "बिटिया" भी साथ