उम्मीद

पिछले दिनों यह खबर चर्चा में रही है कि अब ऐसी तकनीक उपलब्ध हो गई है, जिससे मां के एक रक्त की एक बंूद से यह जाना जा सकता है कि गर्भस्थ भ्रूण का लिंग क्या है। अब इस तकनीक को लेकर बहस भी उठ खडी हुई है कि इसका प्रयोग उचित है या अनुचित। एक ऐसे देष और समाज में, जहां कन्या भ्रूण हत्या के बढते प्रकरणों ने षिषु लिंगानुपात में तो चिंताजनक बदलाव ला ही दिया है, बल्कि हमारे भविष्य के बारे में अनेक संदेहों और आषंकाओं को जन्म दिया है, यह नई तकनीक निःसंदेह खतरनाक है।
एक तरफ हजारों वर्षो की शानदार सांस्कृतिक विरासत की दावेदारी हम करते हैं, समाज और संस्कृति में स्त्री के स्थान योगदान और महत्व का भी गुणगान करते नहीं थकते, तब हमारे समय में बच्चियों की जन्म-दर में आई इस भयावह गिरावट ने क्या हमारी भीतरी सचाई को खोल कर नहीं रख दिया है? पिछली तमाम जनगणनाओं में लिंगानुपात में बेटी का प्रतिषत घटता चला गया है जो अब, हाल की जनगणना में, डरावने स्तर पर जा चुका है। हर कोई जानता है कि यह, कोख में ही बच्चे के लिंग की जांच करवा लेने और यदि भ्रूण, कन्या का हुआ तो उसकी हत्या कर देने की कु-प्रवृत्ति के चलते हुआ है।
समाज में पुरूष के वर्चस्व और स्त्री के प्रति दोयम दर्जे के व्यवहार ने बहुतेरी गलत परम्पराओं को स्थापित किया है। जिन्हें भिन्न-भिन्न कुतर्को, मान्यताओं और आस्थाओं के नाम पर लगातार मजबूत किया जाता रहा है। आधुनिक दौर में जब वैज्ञानिक आविष्कारों ने यह उम्मीद जगाई कि अब जीवन-संघर्ष कुछ आसान हो जाएगा, रोजमर्रा का जीवन कुछ अधिक सुविधायुक्त और बेहतर होगा तब ही कुछ ऐसी स्थितियां निर्मित हुई हैं, जो वैज्ञानिक उन्नति के प्रति ही, एक विरोधभाव पैदा करने लगती है।
यह घातक है। जरूरी जो यह साबित करना है कि विज्ञान अंततः भलाई के लिए ही है। घातक तो वह प्रवृति है जो निहित स्वार्थो के लिए आविष्कारों की उपललिब्धयों का दुरूपोग करती है। जरूरी तो यह है कि हम वैज्ञानिक खोजों का विरोध न करें बल्कि उन प्रवृतियों की तलाष और पहचान करें जो इनका दुरूपयोग संभव करती हैं।
थोडे बरस पहले के समय को याद करंे। उन दिनांे तक यह जानने की कि मां की कोख में आकार में रही संतान बेटी है या बेटा कोई तकनीक और विधि उपलब्ध नहीं थी। तब यह जानते ही कि किसी स्त्री ने गर्भ धारण किया है, पति-पत्नि पहले दिन से लगा कर, बच्चे के जन्म लेने तक के नौ महीनों में एक अबूझ जिज्ञासा और अनन्त कल्पनाओं और सपनों से भरे-पूरे हुआ करते थे। संभावित संतान बेटा होगा तो भावी जीवन कैसा होगा इसके मंसूबें बांधे जाते थे तो यदि बेटी हुई तो भविष्य का ताना-बाना कैसा होगा इसकी कल्पानाएं भी रोमांचकारी हुआ करती थी।

संभावित संतान के लिंग की अनिष्चितता, मां-बाप को मानसिक तौर पर इस बात के लिए तैयार और सक्षम बनाती थी कि बेटी हो या बेटा, उसे स्वीकारना है। समाज में स्त्री की कमजोर स्थिति और सामाजिक-धार्मिक कुरीतियां और भ्रांतियां, बेषक तब भी बेटियों के प्रति एक दोयम भाव जगाती थी। बेटियों का लालन-पालन, बेटों की अपेक्षा खराब तरीके से, कई घरों में हुआ करता था, फिर भी बेटी से उसके जीवन जीने के हक को नहीं छीना जाता था।
बेटी होगी या बेटी, इस जिज्ञासा के बीच मां-बाप अपने भीतर लडकी या लड़के के संभावित पालक होने की क्षमता विकसित कर लेते थे। फिर चाहे, लडकी हो या लडका उनके पास एक सहृदय या सहयोगी पालक होने की संभावनाएं हुआ करती थीं, जो कि अब, जबकि भ्रूण का लिंग गर्भधारण के कुछ ही हफ्तों में जान लिया जा सकता है, तो संभव नहीं रह गया है।
कोई भी मां-बाप जब यह जान लेते है कि होने वाली संतान लडका है या लडकी, तब कन्या भ्रूण की हत्या न करने वाले मां-बाप भी खुद को तयषुदा बेटे या बेटी के मां.-बाप के तौर पर विकसित करेंगे, उनमें बच्चें के लिंग की अनिष्चितता से उपजने वाली जिज्ञासा का रोमांच नहीं रहेगा। ना ही संभावित परिस्थितियों से जूझन की शक्ेित रहेगी क्योंकि तयषुदा हालात उनकी प्राकृतिक प्रवृतियों को निंयत्रित कर लेंगे।
तकनीक का विकास हमें भविष्य के सुवधाजनक और बेहतर होने का आष्वासन देता है, लेकिन इस प्रसंग में ऐसा होता नहीं दिख रहा । विज्ञान के मामले में हमेषा ही यह आषंका बनी रही है कि उसका प्रयोग निर्माण के पक्ष में होगा या ध्वंस के लिए ? सवाल महज इस तर्क के सहारे खारिज नहीं किया जा सकता कि हर सिक्के के दो पहलू हुआ करते हैं । यह सुनिष्चित किया जाना बेहद जरूरी है कि बेजोड़ वैज्ञानिक खोजों का सदुपयोग ही हो । वे मनुष्य जाति के विकास में मददगार ही होनी चाहिए ।
पिछले कुछ दषकों में यह लगने लगा था कि अब स्त्री और पुरूष के बीच बराबरी संभव है । स्त्री से संबंधित, मातृत्व से संबंधित कई भ्रांत धारणाओं को विज्ञान ने गलत साबित कर दिया था । कई वैचारिक आंदोलन उभरे, जिन्होंने स्त्री की आवाज़ को बूलंद किया । स्त्री की इच्दाओं, आकांक्षाओं और सपनों को व्यक्त करने का माहौल बनने लगा । स्त्री की कामेच्छा की अभिव्यक्ति हो या मातृत्व के चयन की, विकल्प हासिल होने की शुरूआत हो चुकी थी । कुछ तकनीकें, कुछ औज़ार, कुछ विधियां ऐसी, ईजाद की जा चुकी थी, जो स्त्री को शारीरिक और मानसिक गुलामी और दीगर जकड़बंदियों से आज़ाद कर रही थी ।
इससे लगता था कि इक्कीसवीं सदी, स्त्री की सदी होगी । अपने सपनों में मनचाहे रंग वो भर सकेगी । मन की उड़ानें, दूर तक उड़ा सकेंगी । उदाहरण बढ़ने लगे थे । बहुत से ऐसे क्षेत्रों में, जो पुरूष के एकाधिकार या विषेषज्ञता के क्षेत्र माने जाते रहे थे, स्त्री की उपस्थिति दर्ज होने लगी थी । उसकी बुद्धि, उसकी लगन, उसकी शक्ति, उसकी मेहनत स्वीकृत होने लगी थी ।
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ऐसे में एक तकनीक जो गर्भस्थ षिषु की उचित देखभाल और संभावित खतरों से सही समय पर बचाव के लिए विकसित की गई थी, दुरूपयोग का षिकार हुई । उससे गर्भ में ही भ्रूण के लिंग को जांच लेने और क्रूरतापूर्वक कन्या भ्रूण को नष्ट कर देने में बरता जाने लगा । लालसा और लोभ ने मिलकर मनुष्य जाति के समतापूर्ण प्राकृतिक जीवन को ही खतरे में डाल दिया । कहां तो, स्त्री को खुद को अभिव्यक्त करने की आज़ादी तय हो रही थी पर अब तो उसके अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया गया था ।
वक़्त अब भी गुज़रा नहीं है । संभावनाएं आज भी जिंदा हैं । जरूरत उन्हें तलाषने और कारगर बनाने की है । हज़ारों बरसों में मस्तिष्क और मेहनत ने मिलजुल कर जो सभ्यता रची है, उसे नष्ट भी नहीं होने दिया जा सकता । पर ऐसा केवल सद्इच्छा रखने अथवा कह देने भर से संभव नहीं होने जा रहा । इस संकट के कुरूप चेहरे को सामने लाना होगा। यदि स्थितियों को सही दिषाओं में नहीं मोड़ा गया तो भविष्य कितना भयानक होगा, उस तस्वीर को साफ-साफ दिखाना होगा।
अपने आदिम पूर्वजों पर ‘बंदर के हाथ में उस्तरा’ की कहावत रचकर हमने उनकी बौद्धिक सीमा को दर्षाया था । आज जब हम, इतिहास के सबसे उन्नत और प्रगत दौर में है, क्या वहीं मुहावरा हम अपने-आप पर ही सटीक नहीं बना रहे हैं ?
स्त्री जब गर्भधारण करती है तो कहा जाता है कि वो ‘उम्मीद’ से है। हम ‘उम्मीद’ इस शब्द के व्यापक मायने को ही काटने-छिलने में जुट गए हैं। उम्मीद में छिपी संभावनाओं, सुख की आकांक्षाओं, मंगल-कामनाओं को बचाने का मतलब अपने भविष्य को बचाना है । भविष्य के किसी भी चित्र में यदि स्त्री अनुपस्थित है, तो भविष्य सुंदर, सुखद और मंगलमय हो ही नहीं सकता । कवियों ने कहा है कि स्त्री ही है जो प्रकृति के रहस्य को जानती है । प्रकृति बचाने के लिए ही स्त्री को बचाना है और इसके लिए संकल्पपूर्वक भावी बेटी को बचाना है ।
हमारी बेटियां, हमारा गौरव होती है । उनके बगैर जीवन, जैसे रौरव नरक होगा । मानवजाति को इसी रौरव से बचाना है तो पहले बेटी को बचाना है । यदि मिलजुल कर हम इस संकट से लड़ेंगे तो मुष्किल नहीं कि दुनिया बची रहेगी । प्रकृति बची रहेगी । स्त्री रहेगी तो ‘उम्मीद’ रहेगी ।
-देवीलाल पाटीदार, मनोज कुलकर्णी


महिलाओं के हक़ में उठते हाथ "बिटिया" भी साथ