कविता: क्या तुम रोक सकोगे पिता ?

सहस्त्राब्दियों पहले
कंस ने जब
मुझे
यों ही पटक कर मार डालना
चाहा
मैं उसके हाथों से छिटककर
ऊपर
आकाश में चली गई
उसे शाप देते हुये
परिणाम का
तुम
मेरे अभिभावक हो
या कहूँ
कि हो सकते थे
तुम्हारे लिये
मैं शाप को रोक लूंगी
किन्तु परिणति
क्या तुम रोक सकोगे, पिता।
- मनोज श्रीवास्तव


महिलाओं के हक़ में उठते हाथ "बिटिया" भी साथ