कविता: बेटियों के बहाने

बेटियों के बहाने
लहराता है दरिया हमारे भीतर
इन्हें वे ही समझते हैं
जिन्होंने ओढ़ी है उम्र भर
रिश्तों की चादर
आओ देखो मुझे मेरी माँ की आँखों से
रेगिस्तान में भी उफन पड़े
हरा समंदर।
- डाॅ. वीणा सिन्हा


महिलाओं के हक़ में उठते हाथ "बिटिया" भी साथ