कविता: तुम्हारा हक है बिटिया

मेरी बेटी
तेरी खातिर रची है दुनिया
जहाँ आसमान में
बादलों के संग इंद्रधनुष नाचते हैं
धरती की कोख में छुपे हैं अनगिनत रंग
सूखे बीजों में भी
गुनगुनाती है फूलों की गंध
चाहो तो परिंदों से पूछ लो
इस धरती के हर रिश्ते पर
तुम्हारा हक है बिटिया।
- डाॅ. वीणा सिन्हा


महिलाओं के हक़ में उठते हाथ "बिटिया" भी साथ