कविता: बेटी की मुंदी पलकों पर

ठहरो, अभी माँ उसे चूम रही है
बेटी की मुंदी पलकों पर
अटकी है माँ की शगुन दृष्टि
छलकती है दूध की नदी
घुलने लगती है चाँदनी
हवाएँ पूछती हैं मौसम का मिजाज
जिंदगी का काफिला
रोशनी के बुर्ज तक
नहीं पहुँचता बगैर दुआओं के।
- डाॅ. वीणा सिन्हा


महिलाओं के हक़ में उठते हाथ "बिटिया" भी साथ