कविता: बेटी की विदाई

वे तीनों अलग-अलग शहरों से चौथे दोस्त की बेटी के ब्याह में आए थे
और कई दिनों बाद इस तरह इकट्ठे हुए थे
इस समय जब दोपहर लगभग ढल रही थी
तीनों घर के सामने एक पेड़ की छाँव में 
बैठे हुए थे
और चौथे की बेटी की विदाई हो रही थी
अभी कुछ देर पहले तक वे हँस रहे थे और आपस में बतिया रहे थे
अब चौथे की बेटी लगभग घर के दरवाजे पर आ पहुँची थी
और रस्म के अनुसार कोई मखाने और पैसे फेंक रहा था
बेटी कभी माँ के और कभी भाई के गले लग कर
रो रही थी
चैथा उसे अपनी एक बाँह के घेरे में लिया था
वह अपने को संयत रखने की भरसक कोशिश कर रहा था
पर उसके आँख की कौरें बार-बार भीग जाती थीं
वह रुमाल को चश्मे के कोनों के पास लाकर
चुपके से उन्हें पोंछ लेता था
वह घर के सामने बैठे तीनों दोस्तों की ओर
देखने से बच रहा था
तीनों दोस्त एकाएक चुप से हो गये थे
जैसे अचानक उनकी सारी बातें खत्म हो गई हों
इनमें से एक की बेटी का ब्याह दस दिन बाद था
और दूसरे की बेटी का ग्यारह दिन बाद
थोड़ी देर पहले दोनों इसी बात पर अफसोस कर रहे थे
कि वे शामिल नहीं हो पाएँगे एक दूसरे की बेटी के ब्याह में
तीसरे की बेटी अभी काॅलेज में पढ़ रही थी
चैथे की बेटी लगभग घर की देहरी तक आ चुकी थी
तीनों दोस्त बीच-बीच में चौथे की तरफ देखते थे
चैथा तीनों से अपनी आँख चुरा रहा था
तीनों में जो सबसे ज्यादा अनुभवी था कह रहा था
कि अभी तो चौथे अपने को बहुत सँभाले हुए है
लेकिन विदा के बाद इसे सँभालना होगा
तीनो दोस्त चुप थे
और एक दूसरे से अपना रोना छिपा रहे थे
तीनों एक दूसरे से नजर चुराते हुए किसी न किसी बहाने
चुपचाप पोंछ लेते थे बार-बार भीग जाती
आँखों की कौरों को
चैथे की बेटी की विदाई में देख रहे थे तीनों
अपनी अपनी बेटी को विदा होते
तुमने देखा है कभी
बेटी के जाने के बाद का कोई घर ?
जैसे बिना चिडि़यों की सुबह
जैसे बिना तारों का आकाश
बेटियाँ इतनी एक-सा होती हैं
कि एक की बेटी में दिखती है दूसरे को अपनी बेटी की शक्ल
चैथे की बेटी जब बैठ कर चली गई कार मंे
तो लगा जैसे ब्रह्मांड में कोई आवाज़ नहीं बची
एकाएक अपनी उम्र लगी हम सबको
अपनी उम्र से कुछ ज़्यादा
- राजेश जोशी


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