ग़ज़ल: लाड़ली बेटी में खुशियों के खज़ाने निकले

कन्या भ्रूण हत्या के विचारों को हराने निकले,
कोख में पल रही बेटी को बचाने निकले ।
ये जरूरी नहीं - हो सोच नया ‘‘टाई’’ का,
ऐसे लोगों के भी विश्वास पुराने निकले।
एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं आदम-हव्वा,
हम इसी सोच की तस्वीर बनाने निकले।
जिसकी बातों पे पुरूष ने न कभी ध्यान दिया,
उसकी बातों में हमेशा बड़े माने निकले।
ऊँची शिक्षा से अगर नाम किया बेटी ने,
देखकर, दोस्त भी बेटी को पढ़ाने निकले।
बेटियों से ही उजाला-सा लगे जीवन में,
लाड़ली बेटी में खुशियों के खज़ाने निकले।
- जहीर कुरैशी


महिलाओं के हक़ में उठते हाथ "बिटिया" भी साथ